कोउक निंदत कोउक बंदत कोउक आइकै दैत है भक्षन।कोउक आइ लगावत चंदन कोउक डारत धूरि ततक्षन॥कोउ कहै यह मूरख दीसत कोउ कहै यह आहि विचक्षन।सुंदर काहु सौं राग न द्वेष सु ये सब जानहुं साधु के लक्षन॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+