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रजनी के अंत कंत-मंदिर कै द्वार भई

कवित्त · लगभग २ मिनट
रजनी के अंत कंत-मंदिरकै द्वार भई,मृग की सी हाई, मृग नैनी तरसति है।गौन को उछाइ सजनीयो हूँ न जानि पावै,कहै गिरिधारी क्यों हूँ कहे न कहति है।बृच्छनि की ओट गहै, बांह में समटि रहै,चंचला की चलनि सौं, चित बिलखति है।अधर धरे नांव नूपुर कियै विराव,चोरी के से भाव, किसोरी छिपैं जाति हैं॥

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