रजनी के अंत कंत-मंदिरकै द्वार भई,मृग की सी हाई, मृग नैनी तरसति है।गौन को उछाइ सजनीयो हूँ न जानि पावै,कहै गिरिधारी क्यों हूँ कहे न कहति है।बृच्छनि की ओट गहै, बांह में समटि रहै,चंचला की चलनि सौं, चित बिलखति है।अधर धरे नांव नूपुर कियै विराव,चोरी के से भाव, किसोरी छिपैं जाति हैं॥

रजनी के अंत कंत-मंदिर कै द्वार भई
गिरिधर पुरोहितकवित्त · लगभग २ मिनट