द्वार रही ठाढ़ी तो, बिसासी’ सासु मो रिसाइ,नंनंद रिसाइ, पिछवारे जाइयतु है।ऊझकैं झरूषां ब्रजवासी गुरुजने देषैं,जिन केरे चित रैन-द्याँस आइयतु है।पल-पल-पल मो कलप लौं बिहात जात,दृग पूतरीन क्यों हूँ कै लिराइयतु है।प्यारे गिरिधारी जू की सांवरी मूरति लौंनी,लोकनि के आगै न बिलो क पाइयतु है॥

द्वार रही ठाढ़ी तो, बिसासी’ सासु मो रिसाइ
गिरिधर पुरोहितकवित्त · लगभग २ मिनट