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मधुकर! ये मन बिगरि परे

पद · लगभग २ मिनट

राग मलार

मधुकर! ये मन बिगरि परे।समुझत नाहिं ज्ञानगीता को हरि-मुसुकानि अरे॥बालमुकुंद-रूप-रसराचे तातें बक्र खरे।होय न सूधी स्वान पूँछि ज्यों कोटिक जतन करे॥हरि-पद-नलिन बिसारत नाहीं सीतल उर संचरे।जोग गंभीर है अंधकूप तेहि देखत दूरि डरे॥हरि-अनुराग सुहाग भाग भरे अमिय तें गरल गरे।सूरदास बरु ऐसेहि रहिहैं कान्हबियोग-भरे॥१५३॥

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