सखी, मेरी नींद नसानी हो।पिवको पंथ निहारत सिगरी रैण बिहानी हो॥सखिअन मिलकर सीख दई मन, एक न मानी हो।बिन देख्यां कल नाहिं पड़त जिय ऐसी ठानी हो॥अंग अंग व्याकुल भई मुख पिय पिय बानी हो।अंतरबेदन बिरह की कोई पीर न जानी हो॥ज्यूं चातक घनकूं रटै, मछली जिमि पानी हो।मीरा व्याकुल बिरहणी सुद बुध बिसरानी हो॥

सखी, मेरी नींद नसानी हो
मीराबाईपद · लगभग २ मिनट