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हिंडोलनाँ तहाँ झूलैं आतम राम

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हिंडोलनाँ तहाँ झूलैं आतम राम।प्रेम भगति हिंडोलना, सब संतन कौ विश्राम॥ टेक॥चंद सूर दोइ खंभवा, बंक नालि की डोरि।झूलें पंच पियारियाँ, तहाँ झूलै जीय मोर॥द्वादस गम के अंतरा, तहाँ अमृत कौ ग्रास।जिनि यह अमृत चाषिया, सो ठाकुर हम दास॥सहज सुँनि कौ नेहरौ गगन मंडल सिरिमौर।दोऊ कुल हम आगरी, जो हम झूलै हिंडोल॥अरध उरध की गंगा जमुना, मूल कवल कौ घाट।षट चक्र की गागरी, त्रिवेणीं संगम बाट।नाद ब्यंद की नावरी, राम नाम कनिहार।कहै कबीर गुण गाइ ले, गुर गँमि उतरौ पार॥18॥

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