चंद सूरज दुइ जोति सरूप। जीता अंतरि ब्रह्म अनूप॥करु रे ज्ञानी ब्रह्म बिचारु। जोति अंतरि धरि आप सारु॥हीरा देखि हीरै करो आदेस। कहै कबीर निरंजन अलेखु॥67॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
हम घर सूत तनहि नित ताना कंठ जनेऊ तुमारेकबीरकविताहम घर सूत तनहि नित ताना कंठ जनेऊ तुमारेकबीर२ मिनट का पाठ