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हाशिया
कविता
कागद को-सो पूतरा, सहजहिं में घुलि जाय
रहीम
दोहा · लगभग २ मिनट
कागद को-सो पूतरा, सहजहिं में घुलि जाय।
रहिमन यह अचरज लखौ, सोऊ खैंचत बाय॥३१॥
॥
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कहु रहीम कैसे बनै, बेर-केर को संग
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काज परे कछु और है, काज सरे कछु और
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रहिमन कीन्ही प्रीत, साहब को भावै नहीं
रहीम
कविता
रहिमन कीन्ही प्रीत, साहब को भावै नहीं
रहीम
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सेत कुसुम के हरवा, भूषन सेत
रहीम
कविता
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रहीम
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सघन कुँज अमरैआ, सीतल छाँहि
रहीम
कविता
सघन कुँज अमरैआ, सीतल छाँहि
रहीम
२ मिनट का पाठ