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हाशिया
कविता
सघन कुँज अमरैआ, सीतल छाँहि
रहीम
बरवै · लगभग २ मिनट
वचन-चतुर नायक
सघन कुँज अमरैआ, सीतल छाँहि।
झगरति आइ कोइलिआ, फिरि उड़ि जाहि॥११३॥
॥
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सखिअन कीन सिंगरवा, रचि बहु भाँति
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सब मिलि करैं निहोरवा, हम कहँ देइ
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