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हाशिया
कविता
यह न रहीम सराहिए, लेन-देन की प्रीति
रहीम
दोहा · लगभग २ मिनट
यह न रहीम सराहिए, लेन-देन की प्रीति।
प्रानन बाजी राखिए, हारि होइ कै जीति॥१४४॥
॥
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मूढ़-मण्डली मैं सुजन, ठहरत नाहिं बिसेखि
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यह रहीम निज संग लै, जनमत जगत न कोइ
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हँसि-हँसि हेरि अरसिआ, सहज सिंगार
रहीम
कविता
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रहीम
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होइ कत कारि बदरिआ, बरखत पाथ
रहीम
कविता
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रहीम
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सेत कुसुम के हरवा, भूषन सेत
रहीम
कविता
सेत कुसुम के हरवा, भूषन सेत
रहीम
२ मिनट का पाठ