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संग्रह
हाशिया
कविता
होइ कत कारि बदरिआ, बरखत पाथ
रहीम
बरवै · लगभग २ मिनट
भविष्य-गुप्ता
होइ कत कारि बदरिआ, बरखत पाथ।
जै हौं घन अमरइआ, संग न साथ॥१७॥
॥
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हरुए गवन नबेलिआ, डीठि बचाइ
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दीपक हिए छिपाइ, नवल बधू घर लै चली
रहीम
कविता
दीपक हिए छिपाइ, नवल बधू घर लै चली
रहीम
२ मिनट का पाठ
सखिअन कीन सिंगरवा, रचि बहु भाँति
रहीम
कविता
सखिअन कीन सिंगरवा, रचि बहु भाँति
रहीम
२ मिनट का पाठ
सघन कुँज अमरैआ, सीतल छाँहि
रहीम
कविता
सघन कुँज अमरैआ, सीतल छाँहि
रहीम
२ मिनट का पाठ