जंगल मैं का सोवनां, औघट है घाटा,स्यंध बाघ गज प्रजलै, अरु लंबी बाटा॥ टेक॥निस बासुरी पेड़ा पड़ै, जमदानी लूटै।सूर धीर साचै मते, सोई जन छूटै॥चालि चालि मन माहरा, पुर परण गहिये।मिलिये त्रिभुवन नाथ सूँ, निरभै होइ रहिये॥अमर नहीं संसार मैं, बिनसै नरदेही।कहै कबीर बेसास सूँ, भजि राम सनेही॥373॥

जंगल मैं का सोवनां, औघट है घाटा
कबीरपद · लगभग २ मिनट