राखि लेहु हमते बिगरी।सील धरम जप भगति न कीनी हौ अभिमन टेढ़ पगरी।अमर जानि संची इह काया इह मिथ्या काची गगरी॥जिनहि निवाजि साजि हम कीये तिनही बिसारि औ लगरी।संधि कोहि साध नहीं कहियौ सरनि परे तुमरी पगरी।कह कबीर इहि बिनती सुनियहु मत घालहु जम की खबरी॥174॥

राखि लेहु हमते बिगरी
कबीरपद · लगभग २ मिनट