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ऊधो! प्रीति न मरन बिचारै

पद · लगभग २ मिनट
ऊधो! प्रीति न मरन बिचारै।प्रीति पतंग जरै पावक परि, जरत अंग नहिं टारै॥प्रीति परेवा उड़त गगन चढ़ि गिरत न आप सम्हारै।प्रीति मधुप केतकी-कुसुम बसि कंटक आपु प्रहारै॥प्रीति जानु जैसे पय पानी जानि अपनपो जारै।प्रीति कुरंग नादरस, लुब्धक तानि तानि सर मारै॥प्रीति जान जननी सुत-कारन को न अपनपो हारै?सूर स्याम सोँ प्रीति गोपिन की कहु कैसे निरुवारै॥१२१॥

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