पहिले घनआनंद सींचि सुजान कहीं बतियाँ अति प्यार पगी।अब लाय वियोग की लाय बलाय, बढ़ाय बिसास दगानि दगी।अँखियाँ दुखियानि कुदानि परी, न कहुँ लगैं कौन घरी सु लगी।मति दौरि थकी, न लहै ठिक ठौर, अमोही के मोह-मिठामठगी॥

पहिले घनआनंद सींचि सुजान
घनानंदसवैया · लगभग २ मिनट