पाप के पुंज सकेलि सु कौन धौं आन धरी मैं बिरंचि बनाई।रूप की लोभनि रीझि भिजायकै हाय इते पै सुजान मिलाई।क्यौं घनआनँद धीर धरैं बिन पाँख निगोड़ी मरैं अकुलाई।प्यास-भरी बरसैं तरसैं मुख देखन कौं अँखियाँ दुखहाई॥

पाप के पुंज सकेलि सु कौन
घनानंदसवैया · लगभग २ मिनट