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पाप के पुंज सकेलि सु कौन

सवैया · लगभग २ मिनट
पाप के पुंज सकेलि सु कौन धौं आन धरी मैं बिरंचि बनाई।रूप की लोभनि रीझि भिजायकै हाय इते पै सुजान मिलाई।क्यौं घनआनँद धीर धरैं बिन पाँख निगोड़ी मरैं अकुलाई।प्यास-भरी बरसैं तरसैं मुख देखन कौं अँखियाँ दुखहाई॥

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