राग सारंग
ऊधो! जोग बिसरि जनि जाहु।बाँधहु गाँठि कहूँ जनि छूटै फिरि पाछे पछिताहु॥ऐसी बस्तु अनूपम मधुकर मरम न जानै और।ब्रजबासिन के नाहिं काम की, तुम्हरे ही है ठौर॥जो हरि हित करि हमको पठयो सो हम तुमको दीन्हीं।सूरदास नरियर ज्यों विष को करै बंदना कीन्हीं॥१२०॥

