करिय सँभार, कोसलराय!और ठौर न और गति, अवलंब नाम बिहाय ॥ १ ॥बूझि अपनी आपनो हितु आप बाप न माय।राम! राउर नाम गुर, सुर, स्वामि, सखा, सहाय ॥ २ ॥रामराज न चले मानस-मलिनके छल छाय।कोप तेहि कलिकाल कायर मुएहि घालत घाय ॥ ३ ॥लेत केहरिको बयर ज्यों भैक हनि गोमाय।त्योंहि राम-गुलाम जानि निकाम देत कुदाय ॥ ४ ॥अकनि याके कपट-करतब, अमित अनय-अपाय।सुखि हरिपुर बसत होत परीछितहि पछिताय ॥ ५ ॥कृपासिंधु! बिलोकिये, जन-मनकी साँसति साय।सरन आयो, देव! दीनदयालु! देखन पाय ॥ ६ ॥निकट बोलि न बरजिये, बलि जाउँ, हनिय न हाय।देखिहैं हनुमान गोमुख नाहरनिके न्याय ॥ ७ ॥अरुन मुख, भ्रू बिकट, पिंगल नयन रोष-कषाय।बीर सुमिरि समीरको घटिहै चपल चित चाय ॥ ८ ॥बिनय सुनि बिहँसे अनुजसों बचनके कहि भाय।‘भली कही’ कह्यो लषन हूँ हँसि, बने सकल बनाय ॥ ९ ॥दई दीनहिं दादि, सो सुनि सुजन-सदन बधाय।मिटे संकट-सोच, पोच-प्रपंच, पाप-निकाय ॥ १० ॥पेखि प्रीति-प्रतीति जनपर अगुन अनघ अमाय।दासतुलसी कहत मुनिगन, ‘जयति जय उरुगाय’ ॥ ११ ॥

