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देह मेरी छूटै पै न छूटै मोह मोहन सौं

कवित्त · लगभग २ मिनट
देह मेरी छूटै पै न छूटै मोह मोहन सौं,खूटै गुर लोग टूटै सब ही सों रसुरी।चाहौ कहौ कुलटा कलंकिनी कुनारि कहौ,चाहौ कहौ मानस है चाहौ कहौ पसु री।‘ठाकुर’ कहत तो सों सीखहि सिखायौ कौन,तैं ही तौ बिचारि कछू मेरो रह्यौ बसु री।नाम बस्यौ रसना मैं अंतर सरूप बस्यौ,आँखिन मैं छबि बसी कानन मै बँसुरी॥

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