देखिहौं, इन नैननि।सुंदर स्याम मनोहर मूरति, अंग-अंग सुख-दैननि॥बृन्दावन-बिहार दिन-दिनप्रति गोप-बृन्द सँग लैननि।हँसि- हँसि हरष पतौवनि’ पावन बाँटि-बाँट पय-फैननि॥‘कुंभनदास’, किते दिन बीते, किये रेनु सुख-सैननि।अब गिरधर बिनु निसि अरु बासर, मन न रहतु क्यों चैननि॥

देखिहौं, इन नैननि
कुंभनदासपद · लगभग २ मिनट