ऊधो! हमैं दोउ कठिन परी।जो जीवैं तो, सुन सठ! ज्ञानी, तन तजैं रूपहरी॥गुन गावैं तौ सुक-सनकादिक, संग धावै तौ लीला करी।आसा अवधि संतोष धरैं तौ धार्मिक ब्रज-सुन्दरी॥स्यामा है सब सखी सुजाती पै सब बिरह-भरी।सोक-सिंधु तरिबे की नौका जिहि मुख मुरलि धरी॥निसिदिन फिरत निरंकुस अति बड़ मातो मदन-करी।डाहैगो सब धाम सूर जो चितौ न वह केहरी॥१८२॥

