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इंद्री खाय गयी जग सारा

पद · लगभग २ मिनट
इंद्री खाय गयी जग सारा।निस दिन चरा करे बन काया, कोई न हांकनहारा॥पोवै रक्त करे तन झंझरा, सरबस जाय नसाई।जैसी भाँति काठ धुन लागै, बहुरि रहै फोकलाई॥होता बीज औंट के लोहू, सो देंही का राजा।ऐसी वस्तु अकारथ खोवै, अपना करै अकाजा॥मनुवा मार भजै भगवंतहि, या मति कबहुँ न ठाना।जियरा दुइ घरी के सुख को, कहत मलूक दीवाना॥

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