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( १) जिव जबते हरितें बिलगान्यो

पद · लगभग ४ मिनट
( १)जिव जबते हरितें बिलगान्यो। तबतें देह गेह निज जान्यो ॥मायाबस स्वरुप बिसरायो। तेहि भ्रमतें दारुन दुख पायो ॥पायो जो दारुन दुसह दुख, सुख-लेस सपनेहुँ नहिं मिल्यो।भव-सूल, सोक अनेक जेहि, तेहि पंथ तू हठि हठि चल्यो ॥बहु जोनि जनम, जरा, बिपति, मतिमंद! हरि जान्यो नहीं।श्रीराम बिनु बिश्राम मूढ़! बिचारु, लखि पायो कहीं ॥( २)आनँद-सिंधु-मध्य तव बासा। बिनु जाने कस मरसि पियासा ॥मृग-भ्रम-बारि सत्य जिय जानी। तहँ तू मगन भयो सुख मानी ॥तहँ मगन मज्जसि, पान करि, त्रयकाल जल नाहीं जहाँ।निज सहज अनुभव रूप तव खल! भूलि अब आयो तहाँ ॥निरमल, निरंजन, निरबिकार, उदार, सुख तैं परिहर् यो।निःकाज राज बिहाय नृप इव सपन कारागृह पर् यो ॥( ३)तैं निज करम-डोरि दृढ़ कीन्हीं। अपने करनि गाँठि गहि दीन्हीं ॥ताते परबस पर् यो अभागे। ता फल गरभ-बास-दुख आगे ॥आगे अनेक समूह संसृत उदरगत जान्यो सोऊ।सिर हेठ, ऊपर चरन, संकट बात नहिं पूछै कोऊ ॥सोनित-पुरीष जो मूत्र-मल कृमि-कर्दमावृत सोवई।कोमल सरीर, गँभीर बेदन, सीस धुनि-धुनि रोवई ॥( ४)तू निज करम-जालल जहँ घेरो। श्रीहरि संग तज्यो नहिं तेरो ॥बहुबिधि प्रतिपालन प्रभु कीन्हों। परम कृपालु ग्यान तोहि दीन्हों ॥तोहि दियो ग्यान-बिबेक, जनम अनेककी तब सुधि भई।तेहि ईसकी हौं सरन, जाकी बिषम माया गुनमई ॥जेहि किये जीव-निकाय बस, रसहीन, दिन-दिन अति नई।सो करौ बेगि सँभारि श्रीपति, बिपति, महँ जेहि मति दई ॥( ५)पुनि बहुबिधि गलानि जिय मानी। अब जग जाइ भजौं चक्रपानी ॥ऐसेहि करि बिचार चुप साधी। प्रसव-पवन प्रेरेउ अपराधी ॥प्रेर् यो जो परम प्रचंड मारुत, कष्ट नाना तैं सह्यो।सो ग्यान, ध्यान, बिराग, अनुभव जातना-पावक दह्यो ॥अति खेद ब्याकुल, अलप बल, छिन एक बोलि न आवई।तव तीव्र कष्ट न जान कोउ, सब लोग हरषित गावई ॥( ६)बाल दसा जेते दुख पाये। अति असीम, नहिं जाहिं गनाये ॥छुधा-ब्याधि-बाधा भइ भारी। बेदन नहिं जानै महतारी ॥जननी न जानै पीर सो, केहि हेतु सिसु रोदन करै।सोइ करै बिबिध उपाय, जातें अधिक तुव छाती जरै ॥कौमार, सैसव अरु किसोर अपार अघ को कहि सकै।ब्यतिरेक तोहि निरदय! महाखल! आन कहु को सहि सकै ॥( ७)जोबन जुवती सँग रँग रात्यो। तब तू महा मोह-मद मात्यो ॥ताते तजी धरम-मरजादा। बिसरे तब सब प्रथम बिषादा ॥बिसरे बिषाद, निकाय-संकट समुझि नहिं फाटत हियो।फिरि गर्भगत-आवर्त सृंसतिचक्र जेहि होइ सोइ कियो ॥कृमि-भस्म-बिट-परिनाम तनु, तेहि लागि जग बैरी भयो।परदार, परधन, द्रोहपर, संसार बाढ़ै नित नयो ॥( ८)देखत ही आई बिरुधाई। जो तैं सपनेहुँ नाहिं बुलाई ॥ताके गुन कछु कहे न जाहीं। सो अब प्रगट देखु तनु माहीं ॥सो प्रगट तनु जरजर जराबस, ब्याधि, सूल सतावई।सिर-कंप, इन्द्रिय-सक्ति प्रतिहत, बचन काहु न भावई ॥गृहपालहूतें अति निरादर, खान-पान न पावई।ऐसिहु दसा न बिराग तहँ, तृष्णा-तरंग बढ़ावई ॥( ९)कहि को सकै महाभव तेरे। जनम एकके कछुक गनेरे ॥चारि खानि संतत अवगाहीं। अजहुँ न करु बिचार मन माहीं ॥अजहुँ बिचारु, बिकार तजि, भजु राम जन-सुखदायकं।भवसिंधु दुस्तर जलरथं, भजु चक्रधर सुरनायकं ॥बिनु हेतु करुनाकर, उदारे, अपार-माया-तारनं।कैवल्य-पति, जगपति, रमापति, प्रानपति, गतिकारनं ॥( १०)रघुपति-भगति सुलभ, सुखकारी। सो त्रयताप-सोक-भय-हारी ॥बिनु सतसंग भगति नहिं होई। ते तब मिलै द्रवै जब सोई ॥जब द्रवै दीनदलयालु राघव, साधु-संगति पाइये।जेहि दरस-परस-समागमादिक पापरासि नसाइये ॥जिनके मिले दुख-सुख समान, अमानतादिक गुन भये।मद-मोह लोभ-बिषाद-क्रोध सुबोधतें सहजहिं गये ॥( ११)सेवत साधु द्वैत-भय भागै। श्रीरघुबीर-चरन लय लागै ॥देह-जनित विकार सब त्यागै। तब फिरि निज स्वरूप अनुरागै ॥अनुराग सो निज रूप जो जगतें बिलच्छन देखिये।सन्तोष, सम, सीतल, सदा दम, देहवंत न लेखिये ॥निरमल, निरामय, एकरस, तेहि हरष-सोक न ब्यापई।त्रैलोक-पावन सो सदा जाकी दसा ऐसी भई ॥( १२)जो तेहि पंथ चलै मन लाई। तौ हरि काहे न होहिं सहाई।जो मारग श्रुति-साधु दिखावै। तेहि पथ चलत सबै सुख पावै ॥पावै सदा सुख हरि-कृपा, संसार-आसा तजि रहै।सपनेहुँ नहीं सुख द्वैत-दरसन, बात कोटिक को कहै ॥द्विज, देव, गुरु, हरि, संत बिनु संसार-पार न पाइये।यह जानि तुलसीदास त्रासहरन रमापति गाइये ॥

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