ऐसो ज्ञान बिचारहु रे, तो तुम आपा तारहु रे॥मानि अमृत संसार में औमान जु खारो रे।औमानै अमृत गिनै, सोई साधू सारो रे॥मांन औमान की ठागनि माँझ, दाझत सब लोई रे।ता झर में सतत झरे तौ अधिकार न कोई रे॥सम लोष्ठ सम काँधना, दुःख-सुख समि जानौ रे।सीत उश्न को बिथा मांनि, मन मं मति आमौ रे॥कोउ निंदौ दुःख पाइके सुख पाइजु कोऊ रे।हरषि-हरषि असतुति करै तुति जोंनौ दोऊ रे॥लख चौरासी जीव जंत अलिभलि जिते जानौ रे।निरबर हाइ सकल माँझ एक ब्रह्म पिछानौ रे॥सकल सासत्र कौ सारभूत ऐ ताँही आही रे।जन तुरसा सुभ सरूप में भिखि रही है नांही रे॥

