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कालिंदी का धार निरधार हैं अधर, गन

कवित्त · लगभग २ मिनट
कालिंदी का धार निरधार हैं अधर, गनअलि के धरत जा निकाई के न लेस हैं।जीते अहिराज, खंडि डारे हैं सिखंडि, घन,इंद्रनील कीरति कराई नाहिं ए सहैं।।एड़िन लगत सेना हिय के हरष-कर,देखत हरत रति कंत के कलेस हैंय़चीकने, सघन, अँधियारे तैं अधिक कारे,लसत लछारे, सटकारे, तेरे केस हैं।।

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