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सोहति उतङ्ग, ससि सङ्ग गङ्ग,

कवित्त · लगभग २ मिनट
सोहति उतङ्ग, ससि सङ्ग गङ्ग,गौरि अरधङ्ग, जो अनङ्ग प्रतिकूल है।देवन कौं मूल, सेनापति अनुकूल, कटिचाम सारदूल कौं, सदा कर त्रिसूल है।।कहा भटकत! अटकत क्यौं न तासौं मन?जातैं आठ सिद्धि नव निद्धि रिद्धि तू लहै।लेत ही चढ़ाइबे कौं जाके एक बेलपात,चढ़त अगाऊ हाथ चारि फल फूल है।।

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