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काम की कमान तेरी भृकुटि कुटिल आली

कवित्त · लगभग २ मिनट
काम की कमान तेरी भृकुटि कुटिल आली,तातैं अति तीछन ए तीर से चलत हैं।घूंघट की ओट कोट, करि कै कसाई काम,मारे बिन काम, कामी केते ससकत हैं।।तोरे तैं न टूटैं, ए निकासे हू तैं निकसैं न,पैने निसि-वासर करेजे कसकत हैं।सेनापति प्यारी तेरे तमसे तरल तारे,तिरछे कटाक्ष गड़ि छाती मैं रहत हैं।।

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