पिय सों बातन बीती रात।वदन बिलोकत सखी स्याम कौ, भूलि गई सुधि गात॥खेलत-हँसत समी नहीं जानौ, पिय दरसन की भाँति।छिन-छिन औरहि औरे उपजत, सुंदर मुख की कांति॥तब तें मोहि न भावै री कछु, कही-सुनी न सुहात।‘रसिक प्रीतम’ के सुख की सुधि मोहि, क्यों हू नाँ बिसरात॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+