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हाशिया
कविता
कबीर तन मन यौं जल्या, विरह अगनि सूँलागि
कबीर
साखी · लगभग २ मिनट
कबीर तन मन यौं जल्या, विरह अगनि सूँलागि।
मृतक पीड न जांणई, जाणैगी यहु आणि॥३७॥
॥
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कबीर जे घन्घै तौ घूलि, बिन घघै घूलै नहीं
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कबीर तष्टा टोकणीं, लीयै फिरै सुभाइ
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हरि जन सुनहि न हरि गुन गावहिं
कबीर
कविता
हरि जन सुनहि न हरि गुन गावहिं
कबीर
२ मिनट का पाठ
हम मसकीन खुदाई बंदे तुम राचसु मन भावै
कबीर
कविता
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कबीर
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कबीर
कविता
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कबीर
२ मिनट का पाठ