ऊधो! कछु कछु समुझि परी।तुम जो हमको जोग लाए भली करनि करी॥एक बिरह जरि रहीं हरि के, सुनत अतिहि जरी।जाहु जनि अब लोन लावहु देखि तुमहिं डरी॥जोग-पाती दई तुम कर बड़े जान हरी।आनि आस निरास कीन्ही, सूर सुनि हहरी॥१२६॥

ऊधो! कछु कछु समुझि परी
सूरदासपद · लगभग २ मिनट