डंडा मुद्रा खिंथा आधारी। भ्रम कै भाई सबै भेषधारी।आसन पवन दूरि करि बवरे। छोड़ि कपट नित हरि भज बवरे॥जिह तू याचहि सो त्रिभुवन भोगी। कहि कबीर कैसो गज जोगी॥105॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+