जम ते उलटि भये हैं राम। दुख बिनसे सुख कियो बिश्राम।बेरी उलटि भये हैं मीता। साकल उलटि सुजन भये चीता॥अब मोंहि सर्ब कुसल करि मान्या। सांति भई जब गोबिंद जान्या॥तन महि होती कोटि उपाधि। उलटि भई सुख सहजि समाधि॥आप पछानै आपै आप। रोग न ब्यापै तीनों ताप॥अब मन उलटि सनातन हूआ। तब जान्या जब जीयत मूआ॥कहु कबीर सुख सहज समाओ। आपि न डरो न अवर डराओ॥169॥

