मेरी सूचीपढ़ना शुरू करें

धन धंधा ब्यौहार सब, मिथ्याबाद

पद · लगभग २ मिनट
धन धंधा ब्यौहार सब, मिथ्याबाद।पाँणीं नीर हलूर ज्यूँ, हरि नाँव बिना अपवाद॥ टेक॥इक राम नाम निज साचा, चित चेति चतुर घट काचा।इस भरमि न भूलसि भोली, विधना की गति है ओली॥जीवते कूँ मारन धावै, मरते को बेरि जिआवै।जाकै हुँहि जम से बैरी, सो क्यूँ न सोवै नींद घनेरी॥जिहि जागत नींद उपावै तिहि सोवत क्यूँ न जगावै॥जलजंतु न देखिसि प्रानी, सब दीसै झूठ निदानी॥तन देवल ज्यूँ धज आछै, पड़ियां पछितावै पाछै॥जीवत ही कछू कीजै, हरि राम रसाइन पीजै॥राम नाम निज सार है, माया लागि न खोई॥अंति कालि सिर पोटली, ले जात न देख्या कोई॥काहू के संगि न राखी, दीसै बीसल की साखी॥जब हंस पवन ल्यौ खेलै, पसरो हाटिक जब मेलै॥मानिष जनम अवतारा, तां ह्नैहै बारंबारा॥कबहूँ ह्नै किसा बिहाँनाँ, तब पंखी जेम उड़ानाँ॥सब आप आप कूँ जाई, को काहू मिलै न भाई॥मूरिख मनिखा जनम गँवाया, बर कौडी ज्यूँ डहकाया॥जिहि तन धन जगत भुलाया, जग राख्यो परहरि माया॥जल अंजुरी जीवन जैसा, ताका है किसा भरोसा।कहै कबीर जग धंधा, काहे न चेतहु अंधा॥296॥

अब कुछ और पढ़ें