सुखनि समाज साज सजे तित सेवैं सदा,जिस नित नए हित-फंदनि गसत हौ।सुख-तम-पुंजनि पठाय दै चकोरनि पै,सुधाधर जान प्यारे भलें ही लसत हौ।जीव सोच सखै गति सुमिरें अनंदघन,कितहूँ उधरि कहूँ धुरि कै रसत हौ।उजरनि बसी है हमारी अँखियानि देखौ,सुबस सुदैस जहाँ भावते बसत हौ॥

सुखनि समाज साज सजे तित सेवैं सदा
घनानंदकवित्त · लगभग २ मिनट