अधिक बधिक तें सुजान, रीति रावरी हे,कपट-चुगी दै फिरि निपट करौ बुरी।गुननि पकरि लै, निपाँख करि छोरि देहु,मरहि न जियै, महा बिषम दया-छरी॥हौं न जानौं, कौन धौं हो यामैं सिद्धि स्वारथ की,लखी क्यौं परति प्यारे अंतरकथा दुरी।कैसें आसा-द्रुम पै बसेरो लहै प्रान-खग,बनक-निकाई घनआनँद नई जुरी॥

अधिक बधिक तें सुजान रीति रावरी हे
घनानंदकवित्त · लगभग २ मिनट