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इहै परम फलु, परम बड़ाई

पद · लगभग २ मिनट
इहै परम फलु, परम बड़ाई।नखसिख रुचिर बिंदुमाधव छबि निरखहिं नयन अघाई ॥ १ ॥बिसद किसोर पीन सुंदर बपु, श्याम सुरुचि अधिकाई।नीलकंज, बारिद, तमाल, मनि, इन्ह तनुते दुति पाई ॥ २ ॥मृदुल चरन शुभ चिन्ह, पदज, नख अति अभूत उपमाई।अरुन नील पाथोज प्रसव जनु, मनिजुत दल-समुदाई ॥ ३ ॥जातरूप मनि-जटित-मनोहर, नूपुर जन-सुखदाई।जनु हर-उर हरि बिबिध रूप धरि, रहे बर भवन बनाई ॥ ४ ॥कटितट रटति चारु किंकिनि-रव, अनुपम, बरनि न जाई।हेम जलज कल कलित मध्य जनु, मधुकर मुखर सुहाई ॥ ५ ॥उर बिसाल भृगुचरन चारु अति, सूचत कोमलताई।कंकन चारु बिबिध भूषन बिधि, रचि निज कर मन लाई ॥ ६ ॥गज-मनिमाल बीच भ्राजत कहि जाति न पदक निकाई।जनु उडुगन-मंडल बारिदपर, नवग्रह रची अथाई ॥ ७ ॥भुजगभोग-भुजदंड कंज दर चक्र गदा बनि आई।सोभासीव ग्रीव, चिबुकाधर, बदन अमित छबि छाई ॥ ८ ॥कुलिस, कुंद-कुडमल, दामिनि-दुति, दसनन देखि लजाई।नासा-नयन-कपोल, ललित श्रुति कुंडल भ्रू मोहि भाई ॥ ९ ॥कुंचित कच सिर मुकुट, भाल पर, तिलक कहौं समुझाई।अलप तड़ित जुग रेख इंदु महँ, रहि तजि चंचलताई ॥ १० ॥निरमल पीत दुकुल अनूपम, उपमा हिय न समाई।बहु मनिजुत गिरि नील सिखरपर कनक-बसन रुचिराई ॥ ११ ॥दच्छ भाग अनुराग-सहित इंदिरा अधिक ललिताई।हेमलता जनु तरु तमाल ढिग, नील निचोल ओढ़ाई ॥ १२ ॥सत सारदा सेष श्रुति मिलिकै, सोभा कहि न सिराई।तुलसिदास मतिमंद द्वंदरत कहै कौन बिधि गाई ॥ १३ ॥

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