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देव- संत-संतापहर, विश्व-विश्रामकर, रामकामारि, अभिरामकारी

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देव-संत-संतापहर, विश्व-विश्रामकर, रामकामारि, अभिरामकारी।शुद्ध बोधायतन, सच्चिदानंदघन, सज्जनानंद-वर्धन, खरारी ॥ १ ॥शील-समता-भवन, विषमता-मति-शमन, राम, रमारमन, रावनारी।खड्ग, कर चर्मवर, वर्मधर, रुचिरल कटि तूण, शर-शक्ति-सारंगधारी ॥ २ ॥सत्यसंधान, निर्वानप्रद, सर्वहित, सर्वगुण-ज्ञान-विज्ञानशाली।सघन-तम-घोर-संसार-भर-शर्वरी नाम दिवसेष खर-किरणमाली ॥ ३ ॥तपन तीच्छन तरुन तीव्र तापघ्न, तपरूप, तनभूप, तमपर, तपस्वी।मान-मद-मदन-मत्सर-मनोरथ-मथन, मोह-अंभोधि-मंदर, मनस्वी ॥ ४ ॥वेद विख्यात, वरदेश, वामन, विरज, विमल, वागीश, वैकुंठस्वामी।काम-क्रोधादिमर्दन, विवर्धन, छमा-शांति-विग्रह, विहगराज-गामी ॥ ५ ॥परम पावन, पाप-पुंज-मुंजावटी-अनल इव निमिष निर्मूलकर्त्ता।भुवन-भूषण, दूषणारि-भुवनेश, भूनाथ, श्रुतिमाथ जय भुवनभर्ता ॥ ६ ॥अमल, अविचल, अकल, सकल, संतप्त-कलि-विकलता-भंजनानंदरासी।उरगनायक-शयन, तरुणपंकज-नयन, छीरसागर-अयन, सर्ववासी ॥ ७ ॥सिद्ध-कवि-कोविकानंद-दायक पदद्वंद्व मंदात्ममनुजैर्दुरापं।यत्र संभूत अतिपूत जल सुरसरी दर्शनादेव अपहरति पापं ॥ ८ ॥नित्य निर्मुक्त, संयुक्तगुण, निर्गुणानंद, भगवंत, न्यामक, नियंता।विश्व-पोषण-भरण, विश्व-कारण-करण, शरण तुलसीदास त्रास-हंता ॥ ९ ॥

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