एकै दानि-सिरोमनि साँचो।जोइ जाच्यो सोइ जाचकताबस, फिरि बहु नाच न नाचो ॥ १ ॥सब स्वारथी असुर सुर नर मुनि कोउ न देत बिनु पाये।कोसलपालु कृपालु कलपतरु, द्रवत सकृत सिर नाये ॥ २ ॥हरिहु और अवतार आपने, राखी बेद-बड़ाई।लै चिउरा निधि दई सुदामहिं जद्यपि बाल मिताई ॥ ३ ॥कपि सबरी सुग्रीव बिभीषन, को नहिं कियो अजाची।अब तुलसिहि दुख देति दयानिधि दारून आस-पिसाची ॥ ४ ॥

एकै दानि-सिरोमनि साँचो
तुलसीदासपद · लगभग २ मिनट