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ऊधो! तुम जो कहत हरि हृदय रहत हैं

पद · लगभग २ मिनट
ऊधो! तुम जो कहत हरि हृदय रहत हैं।कैसे होय प्रतीति क्रूर सुनि ये बातैं जु सहत हैं॥बासर-रैनि कठिन बिरहानल अंतर प्रान दहत है।प्रजरि प्रजरि पचि निकसि धूम अब नयनन नीर बहत है॥अधिक अवज्ञा होत, देह दुख मर्यादा न गहत है।कहि! क्यों मन मानै सूर प्रभु इन बातनि जु कहत है॥२०१॥

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