महाराज रामादर् यो धन्य सोई।गरुअ, गुनरासि, सरबग्य, सुकृती, सूर, सील-निधि, साधु तेहि सम न कोई ॥ १ ॥उपल, केवट, कीस, भालु, निसिचर, सबरि, गीध सम-दम-दया-दान-हीने।नाम लिये राम किये परम पावन सकल, नर तरत तिनके गुनगान कीने ॥ २ ॥ब्याध अपराधकी साध राखी कहा, पिंगलै कौन मति भगति भेई।कौन धौं सोमजाजी अजामिल अधम, कौन गजराज धौं बाजपेयी ॥ ३ ॥पांडु-सुत, गोपिका, बिदुर, कुबरी, सबरि, सुद्ध किये सुद्धता लेस कैसो।प्रेम लखि कृस्न किये आपने तिनहुको, सुजस संसार हरिहरको जैसो ॥ ४ ॥कोल, खस, भील, जवनादि खल राम कहि, नीच ह्वे ऊँच पद को न पायो।दीन-दुख-दवन श्रीरवन करुना-भवन, पतित-पावन विरद बेद गायो ॥ ५ ॥मंदमति, कुटिल, खल-तिलक तुलसी सरिस, भो न तिहुँ लोक तिहुँ काल कोऊ।नामकी कानि पहिचानि पन आपनो, ग्रसित कलि-ब्याल राख्यो सरन सोऊ ॥ ६ ॥

महाराज रामादर् यो धन्य सोई
तुलसीदासपद · लगभग २ मिनट