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स्वारथ रुचत रहीम सब, औगुन हूँ जग माहिं

दोहा · लगभग २ मिनट
स्वारथ रुचत रहीम सब, औगुन हूँ जग माहिं।बड़े-बड़े बैठे लख्यो, पथ-रथ-कूबर छाहिं॥२४७॥

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