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स्वासहु तुरिय जो उच्चरै, तिय है निहचल चित्त

दोहा · लगभग २ मिनट
स्वासहु तुरिय जो उच्चरै, तिय है निहचल चित्त।पूत परा घर जानिए, रहिमन तीनि पवित्त॥२४६॥

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