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हाशिया
कविता
सतगुरु साँचा सूरिवाँ, सबद जु बाह्या एक
कबीर
साखी · लगभग २ मिनट
सतगुरु साँचा सूरिवाँ, सबद जु बाह्या एक।
लागत ही मैं मिल गया, पड्या कलेजै छेक॥७॥
॥
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सतगुरु सवाँन को सगा, सोधी सई न दाति
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सतगुरु हम सूँ रीझि करि, एक कह्या प्रसंग
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कबीर
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