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इति तत राम जपहु रे प्राँनी, बुझौ अकथ कहाँणी

पद · लगभग २ मिनट
इति तत राम जपहु रे प्राँनी, बुझौ अकथ कहाँणी।हीर का भाव होइ जा ऊपरि जाग्रत रैनि बिहानी॥ टेक॥डाँइन डारै, सुनहाँ डोरै स्पंध रहै बन घेरै।पंच कुटुंब मिलि झुझन लागे, बाजत सबद सँघेरै॥रोहै मृग ससा बन घेरे, पारथी बाँण न मेलै।सायर जलै सकल बन दाझँ, मंछ अहेरा खेलै॥सोई पंडित सो तत ज्ञाता, जो इहि पदहि बिचारै।कहै कबीर सोइ गुर मेरा, आप तीरै मोहि तारै॥9॥

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