रहिमन रिस तैं तजत नहिं, बड़े प्रीति की पौरि।मूकन मारत आवई, नींद बिचारी दौरि॥१६४॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
बिन्दु में सिन्धु समान, को कासों अचरज कहैरहीमकविताबिन्दु में सिन्धु समान, को कासों अचरज कहैरहीम२ मिनट का पाठ