उलटत पवन चक्र षट भेदै सुरति सुन्न अनुरागी॥आवै न जाइ मरै न जीवै तासु खोज बैरागी॥मेरा मन मनहीं उलटि समाना।गुरु परसादि अकल भई अवरै नातरु था बेगाना॥निबरै दूरि दूरि फनि निबरैं जिन जैसा करि मान्या॥अलउती का जैसे भया बरेडा जिन पिया तिन जान्या॥तेरी निर्गुण कथा काहि स्यों कहिये ऐसा कोई बिबेकी॥कहु कबीर निज दया पलीता तिनतै सीझल देखी॥26॥

उलटत पवन चक्र षट भेदै सुरति सुन्न अनुरागी
कबीरपद · लगभग २ मिनट