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गम्य अगम्य असंखि अचित उपाधि

सवैया · लगभग २ मिनट
गम्य अगम्य असंखि अचित उपाधि मिल्यौ निरुपाधि कहावै।निरव्वधि है निरवान सदा यह एसौ प्रतछ्छ गहै न गहावै।कला बिनु है रु कला सब वाहि मैं है निरवैव अवैव बनावै।आप अनंत अखंड अपार सु ऐसौ सरीर में कैसैं कै आवै॥

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