सबै गति ओर चलै न हलै बिभु ब्यापक है सब जामैं समावै।निरंतर है अज अंत नहीं नहीं कारन कौं कहि को उपजावै।निसेष परम न वार न पार नहीं परिमान प्रमान जनावै।आप अनंत अखंड अपार सु ऐसौ सरीर मैं कैसैं के आवै॥ ॥साझा करेंसहेजेंअ−अ+
और सुनि सरीर कै बिषै चेष्टा जेतो कछुजसवंत सिंहकविताऔर सुनि सरीर कै बिषै चेष्टा जेतो कछुजसवंत सिंह२ मिनट का पाठ
नाहिं याकैं रूप कछु नाहिं कछु आकृति हैजसवंत सिंहकवितानाहिं याकैं रूप कछु नाहिं कछु आकृति हैजसवंत सिंह२ मिनट का पाठ
देह नाहीं इंद्री मन नाहीं नाहीं बुधि नाहींजसवंत सिंहकवितादेह नाहीं इंद्री मन नाहीं नाहीं बुधि नाहींजसवंत सिंह२ मिनट का पाठ