नाहिं याकैं रूप कछु नाहिं कछु आकृति है,असत हू नाहिं यह नाहिं यह सत है।नाँ काहू सौ उपजी न आप सौं भई है यह,ऐसै कहें वाहि वह कैसे ठहरत है।तासौं कहौ कैसैं करि कहियै जगतहेत,कछुवै न होइ ताकौं कैसैं कहौं हत है।और बिधि कहै एकौ नाहिंनै बनत बात,तातैं मैं बिचारि कह्यौ इच्छा मेरे मत है॥

नाहिं याकैं रूप कछु नाहिं कछु आकृति है
जसवंत सिंहकवित्त · लगभग २ मिनट