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नाहिं याकैं रूप कछु नाहिं कछु आकृति है

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नाहिं याकैं रूप कछु नाहिं कछु आकृति है,असत हू नाहिं यह नाहिं यह सत है।नाँ काहू सौ उपजी न आप सौं भई है यह,ऐसै कहें वाहि वह कैसे ठहरत है।तासौं कहौ कैसैं करि कहियै जगतहेत,कछुवै न होइ ताकौं कैसैं कहौं हत है।और बिधि कहै एकौ नाहिंनै बनत बात,तातैं मैं बिचारि कह्यौ इच्छा मेरे मत है॥

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