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रे चित! च्यंतसि दीनदयालहि

सबद · लगभग २ मिनट
रे चित! च्यंतसि दीनदयालहि, हरि बिन और न कोई।जेहि ध्यावे ब्रह्मांड खंडलो, करता करे सो होई॥जिन्हि जननी के उदर उदक थे, पिंड कीयो दस द्वारा।दियो अधार अगिनि मुख राखे, ऐसा खसम हमारा॥कूर्मी अंड धरे जल अंतरि, तीर पंक तहं नाहीं।पूरन परमानंद पयोधर, चित चिंतित तिहि ठाई॥पाहन कीट गोपि सबहिन थें, मारग कत हूँ नाहीं।कहे धनौं ताका हरि पूरिक, तूं काई जीव डराहीं॥

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